जहाँ से यात्रा आरंभ हुई
सराय हरखू के बच्चों ने दशहरे पर रामलीला और विजयादशमी मनाने का निश्चय किया। सीमित साधन थे, लेकिन उत्साह और श्रद्धा असीम थी।
एक छोटे से बाल-प्रयास से आरंभ होकर नौ दशकों से अधिक समय तक जीवित रही आस्था, संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता की कहानी।
सराय हरखू के बच्चों ने दशहरे पर रामलीला और विजयादशमी मनाने का निश्चय किया। सीमित साधन थे, लेकिन उत्साह और श्रद्धा असीम थी।
स्व. श्री प्रेमनाथ श्रीवास्तव, स्व. श्री प्रकाशनाथ श्रीवास्तव और स्व. श्री जयंती प्रसाद श्रीवास्तव ने बाल आयोजन को दिशा, व्यवस्था और स्थायित्व दिया। उनके संकल्प ने धर्म मण्डल की नींव रखी।
बुधवार के दिन बच्चों ने गाँव और धनियामऊ बाजार में घोषणा की कि अगले दिन विजयादशमी मनाई जाएगी। दुकानदार मैदान पहुँचे, बच्चों ने रामलीला प्रस्तुत की और रावण का पुतला दहन हुआ।
परिवारों और ग्रामवासियों ने बच्चों के प्रयास को अपनाया। चंदा, मंच, वेशभूषा, संवाद और आयोजन व्यवस्था क्रमशः विकसित होने लगी।
पुराने रामलीला निमंत्रण-पत्रों का संग्रह संस्था की बदलती प्रस्तुति, सदस्यों और सांस्कृतिक यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया।
पचास वर्षों की यात्रा का उत्सव विशिष्ट अतिथियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक सहभागिता के साथ मनाया गया।
साठ वर्ष पूर्ण होने पर विशाल जनसमूह, विविध कार्यक्रमों और विजयादशमी मेले के साथ गौरवशाली आयोजन हुआ।
पचहत्तर वर्षों की निरंतर सांस्कृतिक सेवा को भव्य समारोह में सम्मानित किया गया।
पाँच दिवसीय रामलीला और छठे दिन विजयादशमी मेला आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और श्रीराम के आदर्शों से जोड़ता है।